वापसी: जब दीवारों ने बोलने से रोका, तो हम अपने घर लौट आए
नमस्कार पाठकों!
कहते हैं कि अपना घर, अपना ही होता है। चाहे वह ईंट-गारे का हो या 'ब्लॉगस्पॉट' के पन्नों का। पिछले कुछ सालों से हम 'डिजिटल दुनिया' के बड़े आलीशान मोहल्लों (फेसबुक) में अपनी दुकान सजाए बैठे थे। हमें लगा था कि वहां भीड़ ज्यादा है, तो बात दूर तक जाएगी। पर हमें क्या पता था कि वहां 'बात' की कीमत नहीं, 'पीठ खुजलाने' की रस्म की कीमत है।
आजकल की सोशल मीडिया की दुनिया वैसी ही है जैसे कोई तानाशाह आपको अपने ड्राइंग रूम में बिठाए, चाय पिलाए, और जैसे ही आप सच बोलना शुरू करें, वह आपको गर्दन पकड़कर बाहर निकाल दे और कहे— "आपका चेहरा हमारे नियमों के खिलाफ है।" मेरे साथ भी यही हुआ। हमारे फेसबुक पेजों को बिना बताए 'शहीद' कर दिया गया। अपराध? शायद यह कि हमारी कलम से निकलने वाली स्याही कुछ ज्यादा ही गाढ़ी थी, या शायद हमारा व्यंग्य उन मशीनी दिमागों (एल्गोरिदम) के लिए बहुत तीखा था। वहां सिंदूर को खून और सच को 'कम्युनिटी स्टैंडर्ड' का उल्लंघन मान लिया जाता है।
परसाई जी ने कभी कहा था— "तानाशाह हमेशा डरपोक होता है, उसे डर होता है कि कहीं कोई सच न बोल दे।" तो साहब, हमने भी तय किया कि अब उन किराये के मकानों में रहने की जरूरत नहीं जहाँ सांस लेने के लिए भी एल्गोरिदम की इजाजत मांगनी पड़े। हम वापस अपने पुराने किले, 'चौथा खंभा' पर लौट आए हैं। यह वह जमीन है जहाँ हमने लिखना सीखा था, और यह वह छत है जिसे कोई विदेशी कंपनी अपनी मर्जी से नहीं गिरा सकती।
अब यहाँ से फिर वही सिलसिला शुरू होगा:
वही तीखे व्यंग्य जो सत्ता और समाज के चश्मे उतारने का दम रखते हैं।
वही गहन शोध जो श्री माँ और श्री अरबिंदो के दर्शन की गहराइयों तक ले जाएगा।
और वही निर्भीक आवाज़ जिसे न कोई 'ब्लू टिक' का लालच दबा सकता है और न ही कोई 'बैन' की धमकी।
'चौथा खंभा' फिर से खड़ा है। धूल झाड़ दी गई है, कलम में नई स्याही भर ली गई है। अब मोर्चा यहीं से सम्भाला जाएगा।
आप सब का स्वागत है, अपनी इस पुरानी पनाहगाह में।
— वरुण की कलम से

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